वह जज जो डिजिटल गिरफ्तारी का शिकार बन गए - Full Story
सुबह का वक्त था। सेवानिवृत्त ज़िला जज आर. के. शर्मा रोज़ की तरह अख़बार पढ़ते हुए चाय पी रहे थे। तभी उनका मोबाइल फ़ोन बजा — नंबर दिल्ली का था। “गुड मॉर्निंग, सर। मैं दिल्ली पुलिस की साइबर क्राइम ब्रांच से बोल रहा हूँ,” फ़ोन के दूसरी तरफ़ एक गंभीर और आत्मविश्वासी आवाज़ थी। “आपका आधार कार्ड एक मनी लॉन्ड्रिंग केस में इस्तेमाल हुआ है। कृपया थोड़ी देर सहयोग करें।” जज चौंक गए। “मनी लॉन्ड्रिंग? ये कैसे हो सकता है? ज़रूर कोई गलती हुई है।” आवाज़ बोली, “सर, आपके नाम से एक एफआईआर दर्ज है। हो सकता है आप किसी ठगी के शिकार हुए हों, लेकिन जब तक जाँच पूरी नहीं होती, आपको इसी सिक्योर लाइन पर रहना होगा।” बात में आत्मविश्वास था, टोन में अधिकार। पृष्ठभूमि में आवाज़ें भी सुनाई दे रही थीं — जैसे किसी दफ्तर में कॉल हो रही हो। कुछ मिनट बाद कॉल वीडियो कॉल में बदल गई। स्क्रीन पर एक व्यक्ति पुलिस की वर्दी में दिखाई दिया, पीछे दीवार पर Delhi Cyber Crime Branch का लोगो और भारतीय झंडा साफ़ नज़र आ रहा था। “गुड मॉर्निंग, जस्टिस शर्मा,” उसने सम्मानपूर्वक कहा। “यह गोपनीय जांच है, कृपया किसी से बात न करें ...